वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की भी कथा है जो लंकापति रावण से जुड़ी है |एक बार जब रावण ने शिव तपस्या करनी शुरु किया और सालों तक तपस्या करने के बाद शिव जी ने रावण को उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर मनोवांछित वरदान दिया | रावण ने भगवान शिव को कैलाश पर्वत से अपने साथ लंका ले जाने की इच्छा व्यक्त किया |

भगवान शिव ने खुद लंका जाने से मना कर दिया, लेकिन अपने भक्त रावण को ज्योतिर्लिंग ले जाने की सलाह दी | साथ ही शर्त लगा दी कि इसे अगर रास्ते में कहीं धरती पर रखा, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा, वहां से कोई उसे उठा नहीं पाएगा |

इधर, भगवान विष्णु नहीं चाहते थे कि ज्योतिर्लिंग लंका पहुंचे | उन्होंने गंगा माँ को रावण के पेट में समाने का अनुरोध किया | गंगा माँ जैसे ही रावण के पेट में समाई, रावण को तीव्र लघुशंका लगी | वह सोचने लगा कि किसको ज्योतिर्लिंग सौंपकर वह लघुशंका से निवृत्त हो | उसी क्षण ग्वाले के वेश में भगवान विष्णु वहां प्रकट हुए |

रावण ने ग्वाले को ज्योतिर्लिंग सौंप दिया और हिदायत दी कि जब तक वह न आए, तब तक ज्योतिर्लिंग को वह जमीन पर न रखे | रावण लघुशंका करने लगा, गंगा माँ के प्रभाव से उसे निवृत्त होने में काफी देर लग गई |

वह जब लौटा, तो ग्वाला ज्योतिर्लिंग को जमीन पर रखकर विलुप्त हो चुका था | इसके बाद रावण ने ज्योतिर्लिंग को उठाने की लाख कोशिश की, मगर सफल नहीं हो सका, उसे खाली हाथ लंका लौटना पड़ा, बाद में सभी देवी-देवताओं ने आकर उस ज्योतिर्लिंग को विधिवत स्थापित किया और पूजा-अर्चना की |

काफी दिनों बाद बैजनाथ नामक एक चरवाहे को इस ज्योतिर्लिंग का दर्शन हुआ | वह प्रतिदिन इसकी पूजा करने लगा | इसी कारण इस ज्योतिर्लिग का नाम बैद्यनाथ हो गया |

बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक पवित्र वैद्यनाथ शिवलिंग झारखंड के देवघर में स्थित है. इस जगह को लोग बाबा बैजनाथ धाम के नाम से भी जानते हैं | कहते हैं भोलेनाथ यहां आने वाले की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं | इसलिए इस शिवलिंग को ‘कामना लिंग’ भी कहते हैं |